HISTORY of JATIYA SAMAJ!

जटिया जाति का इतिहास

जटिया जाति का जो इतिहास है वह बहुत पुराना है, जो जानकारी प्राप्त हैं वह यह है कि जटिया जाति सन् 1911 की जनगणना में भी उल्लेखित है, तथा उस समय जटिया जाति, चमार जाति की सबसे की बड़ी उपजाति के रूप में जानी जाती थी। जटिया जाति 1911 की जनगणना के समय चमार जाति की सबसे बड़ी उपजाति होकर चमार जाति की 20 प्रतिशत से अधिक थी। कालान्तर में विभिन्न जातियों में बॅंटकर अपने मूल स्वरूप को छोड़कर विलुप्ति के कगार पर आ गई। जिसका उदाहरण मध्यप्रदेश है। सन् 1920 में प्राचीन भारत के सम्पादक श्री देवीदासजी ने जटिया चमारों की एक सभा बुलाई इस सभा में जटिया चमारों को यादव क्षत्रिय बताया। जटिया चमारों को यादव क्षत्रिय बनाने के लिये बकायदा एक आन्दोलन भी चलाया। इस आन्दोलन के मार्फत अहीरों को चुनौती दी गई कि तुम लोग असली यदुवंशी नहीं हो, असली यदुवंशी जटिया है। इसके बाद जाटव लिखना प्रारंभ किया तथा बाद में नाम के आगे जाटववीर लिखने लगे। 1920 में डॉं. माणिकचन्द की अध्यक्षता में भारत वर्षीय जाटववीर युवा परिषद का गठन किया गया। इस परिषद ने इंग्लेण्ड में भारतीय मामलों के मंत्री लार्ड जटलेण्ड को एक ज्ञापन दिया। इस ज्ञापन में यह मांग की गई कि जटिया चमारों को स्थाई रिकार्ड में जाटव लिखा जावे। किन्तु इसके बाद भी इन नव जाटवों को जाटव चमार के नाम से ही पुकारते है।

बैरवा महासभा के गठन में स्वामी विवेकानन्द (चमार) और दिल्ली के सोहनलालजी का विशेष सहयोग बताया जाता है। सन् 1940 में सोहनलालजी ने बड़ौदा, अहमदाबाद (गुजरात), बम्बई और राजपूताना, मध्यप्रदेश में इन्दौर तथा उत्तरप्रदेश के आगरा, मथुरा एवं बुलन्दशहर आदि स्थानों का भ्रमण कर दिल्ली के विवेकानन्द जयपुर के मुनिश्रनन्द और इन्दौर के झुथालाल से विचार विमर्श कर महाभारत से बैरवा शब्द खोज निकाला। दिल्ली के पदमपुर में 1944 में चमारों की विभिन्न उपजातियों के अग्रणी व्यक्तियों की एक आम सभा आयोजित की गई। जिसमें निम्न बिन्दु पारित किये गये।

1. बैरवा नाम की एक अलग जाति बनाई जावे।
2. इस जाति के नाम से अखिल भारतीय स्तर का एक संगठन बनाया जावे।
3. राजस्थान में दलितों पर हो रहे अत्याचार के विरूध्द विरोध प्रदर्शन किया जावे।

प्रारंभ में संगठन का नाम अखिल भारतीय बैरवा राजपूत सभा रखा गया। बाद में राजपूत शब्द हटा दिया गया। तथा अप्रेल 1946 से अखिल भारतीय बैरवा महासभा संगठन की स्थापना हुई। जो जटिया चमार ही बैरवा बने है। तथा वर्तमान में जटिया जाति के परिवार राजस्थान में बैरवा जाति अपनाते जा रहे है। मध्यप्रदेश में जटिया शहरी क्षेत्र नीमच, मन्दसौर, रतलाम, उज्जैन, इन्दौर, खरगौन, खण्डवा, देवास, शाजापुर आदि जिलो में मोची जाति का उपयोग करते है। जबकि नीमच एवं मन्दसौर जिलों के ग्रामीण क्षेत्र में जाटव के नाम से भी जाने जाते है। तथा भोपाल, होशंगाबाद, ईटारसी क्षेत्र में देशवाली के नाम से जाने जाते है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि अलग अलग स्थानों पर अलग अलग जातियों के बाद भी इन सभी जातियों में आपसी पारिवारिक रिश्तेदारी एवं बेटी व्यवहार बदस्तूर जारी हैं। जो हमारी एकता प्रतीक है।

बालचन्द वर्मा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
सकल जटिया समाज
मुख्यालय नीमच (म.प्र.)






जटिया जाति की उत्पति के आधार भूत कारण

व्यापक रूप से प्रचलित सामाजिक एवं धार्मिक रीति रिवाज है, जिनके आधार पर आज उन व्यवहारिकताओं की जानकारी हॉंसिल करना कठिन अवश्य है। किन्तु जातियों के विशिष्ट गुणों की जानकारी हॉंसिल के कारण भले ही पर्याप्त नहीं भी है। फिर भी कुछ जातियां निम्न प्रस्थिति में आई। भारत में एक के बाद एक जाति की पराजय बार बार होने वाली घटना रही है। इस तरह की घटनाऐं देश के बड़े एवं छोटे भागों में होती रही है। स्थानीय इतिहास से यह तथ्य पूरी तरह स्पष्ट है और हम विदेशी एवं स्थानीय विजेताओं के बारम्बार आक्रमणों के कारण अत्यधिक जातियों एवं गोत्रों के उत्थान और पतन तथा उसके परिणाम स्वरूप न्यूनाधिक रूप से एक न्यायिक सतत प्रक्रिया के रूप में प्रजातियों एवं गोत्रो के सामाजिक वितरण के पुर्ननिर्माण को देख सकते है। इसका तात्पर्य यह कि एक व्यवसायिक समूह की निर्धारित हैसियत उन समूहों के बार बार शामिल होने के साथ साथ चल सकती है, जिनके द्वारा वे उच्च स्थिति से निम्न स्थिति में आये। इसका कारण यह कि बदलते समय के साथ साथ अपनी पहचान और प्रतिष्ठा कायम नहीं रख सकी और परिणाम स्वरूप वह निम्न प्रस्थिति में आ गई। इस तरह की घटनाऐं बहुत से गोत्र या परिवारों या उपजातियों के नामों के कारण होती है। जैसे बनौधिया, उज्जैनी, चन्धेरिया, सरवरिया, कनौजिया, चौहान, चन्देल, सक्सेना, सकरवार, भदरौड़िया तथा बुन्देला यह नाम राजपूत जातियों के है और चमारों द्वारा इनका प्रयोग उनकी अधिनता की ओर इंगित करता है। इसका अर्थ यह कि जातिय सम्मिश्रण भी हो सकता है। जैसे कि जटिया के मामले में है। इन परम्परागत सात जातियों के नाम अलग अलग स्थानों पर भिन्न भिन्न है और उनकी मान प्रतिष्ठा का क्रम भी अलग अलग है।

संयुक्त प्रान्त के चमारों के सभी वर्गो के बीच दो बड़ी उपजातियां सर्वाधिक प्रभावशाली एवं स्थापित थी। यह है जटिया और जैसवार पहली उपजाति (जटिया) जिसमें चमारों की कुल जनसंख्या के 20 प्रतिशत से ज्यादा लोग शामिल थे। चमारों की कुल जनसंख्या में लगभग 40 प्रतिशत संख्या इन्ही दो उपजातियों की थी। दोनो ही उपजातियां अपनी श्रेष्ठता का दावा करती है। चमारों की सभी उपजातियों में जटिया का दावा सर्वोच्च है। जटिया अथवा जटुवा न केवल मध्य एवं ऊपरी दोआब और रूहेलखण्ड में बल्कि दिल्ली और गुड़गांव से जुड़े पंजाब (वर्तमान हरियाणा) में भी बहुत बड़ी संख्या में पाये जाते है। इस उपजाति के लोग खेती बाड़ी भी करते है। जटिया के संबंध में मूल (उद्भव) में दो विचार है। कुछ कहते है कि जटिया नाम जट से बना है जिसका तात्पर्य ऊॅंट हांकने वाला, जबकि दूसरे का कहना कि उनका नाम जाट जाति से जोड़ता है। यह भी कहा जाता है कि चमारों के साथ जाटों के विवाह के कारण उत्पन्न हुए है। नेसफिल्ड का विचार है कि यदु कबीला (जनजाति) से निकली शाखा है, जिसमें कृष्ण पैदा हुए है। हालांकि पंजाब के जटिया घोड़े और ऊॅंटों की खालों को कमाने का कार्य करते है। राजपूताना के पूर्वी भाग में चमड़े का काम करने वाली अन्य जातियां बानुभी, बोला, मेघवाल, रेगर, जटिया, चन्दोर, सुखाड़िया, मोवापुरिया, कोसोटिया, और दमड़िया है। बीकानेर में बलाइ्र्र जाति के लोग चमड़े का काम करते है।

बालचन्द वर्मा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
सकल जटिया समाज
मुख्यालय नीमच (म.प्र.)






जटिया जाति की 5 पुरानी पहचान

1. रांपी सीधी दिशा में चलानाः- हमारे समाज के जो भी व्यक्ति जुते चप्पल या अन्य कार्य करते थे या कर रहे है वह सब रांपी का उपयोग सीधी दिशा में करते।
2. जटिया जाति की महिलाओ के लिये नाक छेदन करवाने की मनाहीः- ऐसी मान्यता है कि जटिया जाति की महिलाओं को सती का श्राप है। अतः नाक छेदन नहीं करवाया जाता है।
3. जटिया जाति के व्यक्ति रस्सी बनाने का सन नहीं गलाते है।
4. जटिया जाति के व्यक्ति बैलों को बधिया भी नहीं करते है।
5. जूतियाँ सिलने में जटिया जाति के व्यक्ति जूती की टोह से एड़ी की ओर सिलते हुए जाते है। जबकि अन्य एड़ी से टोह की ओर सिलते हुए जाते है।

जगन्नाथ पंवार (भियाणिया)
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
सकल जटिया समाज
मुख्यालय नीमच (म.प्र.)